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कुमार की ये कैसी नाराजगी, जब सत्ता के लिए आये ही नहीं तो सीट जाने का कैसा दुख?

कवि कुमार का “आप” का सफर

“मेरे लहजे की छेनी से गड्ढे कुछ दबता तब, मेरे लफ्जों पर मरते थे, वो कहते हैं मत बोलो. ” मत बोलो! ये अल्फाज आम आदमी पार्टी के संस्थापकों में से एक रहे डॉ कुमार विश्वास के हैं. गूगल पर सर्च करने बैठो तो कुमार विश्वास के ऐसे कई शेर और कविताएं मिल जाएंगी जिनमें उन्होंने किसी न किसी पर निशाना साधा होगा. चाहे फिर वो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हों या भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. बहरहाल उनका ज्यादातर ध्यान केजरीवाल पर आरोप मढ़ने में ही निकल जाता है. जिसका एक वाजिव कारण है उन्हें पार्टी की तरफ से राज्यसभा न भेजना.

विश्वास की ये कैसी नाराजगी?

लेकिन सवाल उठता है कि कवि कुमार विश्वास की ये कैसी नाराजगी है? जिसमें वह “आप” संयोजक अरविंद केजरीवाल को बार-बार निशाने पर लेते हैं कभी कविताओं के जरिए तो कभी किसी शायरी की मदद से. हाल ही में उन्होंने केजरीवाल पर मानहानी के मामले में मजीठिया से माफी मांगने पर कविता लिख कर तंज कसा था. जिसमें वह कहते हैं कि एकता बाँटने में माहिर है , खुद की जड़ काटने में माहिर है, हम क्या उस शख़्स पर थूकें जो खुद, थूक कर चाटने में माहिर है ! ऐसी भी क्या नाराजगी जो अपने मित्र को ही ऐसे जलील करना पड़ रहा है. असल में खेल राजनीति का है, खेल कुर्सी का , खेल राज्यसभा पहुंचने का है.

अपनों से ही दूर हुए कुमार विश्वास

आम आदमी पार्टी के गठन के साथ ही इस बात पर लगातार जोर दिया जाता था कि पार्टी का गठन न तो सत्ता पाने के लिए हुआ है और न ही कुर्सी के लालच में. फिर क्यों? कुमार विश्वास राज्यसभा जाने के लिए इतने लालायित थे. कह सकते हैं कि कुमार विश्वास अपने ही विचारों पर खरे नहीं उतर पाए. क्योंकि पार्टी के संस्थापकों में उनका नाम भी टॉप लेवल पर है. अगर ये सब सत्ता या कुर्सी के लिए कुमार विश्वास कर रहे हैं तो उन्हें एक बार फिर से अपने उन विचारों पर ध्यान देना चाहिए जब वह कहते थे कि हम कभी सत्ता पाने के लिए नहीं आये हैं.

राज्यसभा का टिकट नहीं मिलने पर कुमार ने केजरीवाल पर शायराना अंदाज में निशाना साधा था. उन्होंने बताया कि उन्हें पार्टी से राज्यसभा टिकट इसलिए नहीं मिला क्योंकि वह चापलूसी करना नहीं जानते. इस मौके पर उन्होंने एक बार फिर अपने अंदाज में कहा कि  ‘मेरे लहजे में जी-हुजूर न था, इससे ज्यादा मेरा कसूर न था’. बहरहाल कसूर किसका था और किसका है ये तो वक्त ही बहतर बता सकता है लेकिन अभी भी विश्वास की राज्यसभा जाने की वजह सामने नहीं आई.

 

 

क्या होगा कुमार विश्वास का ?

इस सब के बाद केजरीवाल और विश्वास के बीच और मतभेद हो गए. एक तरफ विश्वास अपने अंदाज में केजरीवाल पर निशाना साध रहे थे तो दूसरी तरफ वह पार्टी से दूर होते गए.  हाल ही में राजस्थान चुनाव को लेकर आम आदमी पार्टी ने घोषणा करते हुए कुमार विश्वास से राजस्थान प्रभारी का पद भी वापस ले लिया. इसके बाद एक बार फिर कुमार विश्वास ने अपने अंदाज में पार्टी पर निशाना साधा और एक कविता लिख डाली, कविता की कुछ पंक्तियां इस तरह की हैं कि “हम शब्द-वंश के हरकारे,सच कहना अपनी परम्परा. हम उस कबीर की पीढ़ी,जो बाबर-अकबर से नहीं डरा. पूजा का दीप नहीं डरता,इन षड्यंत्री आभाओं से. यहां कोई गफलत नहीं होनी चाहिए कि कुमार विश्वास कभी भी पार्टी छोड़ सकते हैं, उनके द्वारा किए गए ट्वीट और हमले पार्टी लगातार बर्दाश्त करती आ रही है, हो ये भी सकता है कि खुद पार्टी विश्वास को बाहर का रास्ता दिखा दे. लेकिन इन सब के बीच सत्ता किसे चाहिए और किस जगह पर चाहिए ये सवाल फिर पूछना चाहिए कि आखिर विश्वास की ये कैसी नाराजगी जो खत्म होने का नाम नहीं ले रही ? जब गठन ही कुर्सी के लिए नहीं हुआ तो सीट न मिलने पर कैसा दुखा.

हो सकता है कि विश्वास ये सोच कर बैठे हों कि जो आज तेरा है कल वो किसी और का होगा.

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