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नेता जो “आप” का साथ छोड़ गए, लेकिन फिर भी क्या मजबूत रही आम आदमी पार्टी?

सियासत का केंद्र राजधानी

भारत की राज़धानी दिल्ली सियासत का केंद्र है. यहां राजनीति होती है और राजनीति पर बवाल भी. संसद से सड़क तक राजनीति की बिसाद पर यहीं बाज़ी लगाई जाती है. लेकिन सियासत कहां किसी की होती है. अन्ना आंदोलन के वक्त जन्मी आम आदमी पार्टी इस बात का उदाहरण है. दिल्ली में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर दिल्ली की जनता का दिल जीतने वाली पार्टी अपने ही नेताओं के दिल में नहीं उतर पाई. और एक-एक कर पार्टी के नेताओं ने पार्टी का साथ छोड़ दिया. लेकिन ये सियासत है, कौन किसके बिना रुकता है.

सौ.गूगल

कभी योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण इस पार्टी के कद्दावर नेता हुआ करते थे लेकिन 2015 में पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते इन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. वैसे तो आम आदमी पार्टी को छोड़ने वाले मंत्रियों की फेहरिस्त लंबी है. कपिल मिश्रा भी उन्में से एक हैं, जिन्होंने अरविंद केजरीवाल पर दो करोड़ रूपये लेने का आरोप लगाया था.

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आप नेता और मशहूर कवि कुमार विश्वास और अरविंद केजरीवाल के बीच भी रिश्ते कुछ खास नहीं है. कई बार दोनों नेता मनमुटाव के कारण आमने सामने भी आए हैं. बहरहाल नेता भले ही पार्टी से चले गए लेकिन आम आदमी पार्टी की मजबूती बढ़ती गई. इन सब के बीच दिल्ली सरकार को दिल्ली की जनता का भी पूरा साथ मिला. लेकिन सवाल अब भी कई हैं जो आने वाले चुनावों के बाद ही साफ हो पाएंगे.