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कपड़ों और जूतों की चाह ने बना दिया संदीप सिंह को ‘फ्लिकर सिंह’? ‘सूरमा’ की कहानी आपको रुला देगी…

देश के नक्शे में एक राज्य है हरियाणा..कहते हैं हरियाणा खिलाड़ियों की जननी है। इसी हरियाणा के कुरुक्षेत्र में पैदा हुआ था वो शख्स जिसकी कहानी एक मिसाल है। मिसाल है उन तमाम लोगों के लिए जो संघर्ष की डगर पर चलते हैं तो मगर राह मुश्किल देखकर हार मान लेते हैं। सूरमा की कहानी आपको ज़िदंगी में आगे बढ़ने की प्रेरणा देगी। तो चलिए सूरमा की शुरु से शुरुआत करते हैं।

हॉकी में नहीं थी दिलचस्पी

हरियाणा में एक शहर है कुरुक्षेत्र, जहां महाभारत हुई थी…इस शहर में एक छोटा सा कस्बा है शाहबाद मारकंडा। यहां जन्म हुआ था संदीप सिंह का। संदीप सिंह जो ड्रैक फ्लिक के उस्ताद माने जाते हैं। हॉकी टीम के अपने नाम की तूती बुलवाने वाले संदीप सिंह को दरअसल, हॉकी में कोई दिलचस्पी ही नहीं थी। संदीप सिंह वो लड़का जो कभी हॉकी ही नहीं खेलना चाहता था। फिर हॉकी में इतनी कामयाबी कैसे…?

दरअसल, संदीप सिंह नहीं बल्कि उनके बड़े भाई हॉकी खेला करते थे। हॉकी में तो नहीं लेकिन संदीप सिंह को कपड़ों और जूतों की लालसा होती थी। लेकिन घरवालों ने संदीप के सामने एक शर्त रख दी कि इन सबके के लिए हॉकी खेलनी पड़ेगी। बचपन में कपड़ों और जूतों की उस लालसा ने ही भारत को एक चमकता सितारा दिया।

17 साल में कामयाबी मानो एक सपना

अब हॉकी खेलने का सफर शुरु हो चुका था। वो 17 साल के थे जब 2003 में पहली बार इंडियन टीम में अपनी जगह बनाई। एक साल के अंदर ही यानि 2004 में संदीप एथेंस ओलंपिक पहुंच गए। इतनी कम उम्र में इतनी कामयाबी मानो किसी सपने की तरह थी। अब तक तो वो ड्रैग फ्लिकर बन चुके थे। ड्रैग फ्लिक हॉकी के खेल में स्कोर लेने की एक तकनीक है। लेकिन कहते हैं ना कामयाबी यूं ही नसीब नहीं हो जाती। अभी तो संदीप सिंह को बहुत कुछ देखना था। असल संघर्ष तो अब शुरु हुआ था। उनकी ज़िदंगी में एक मोड़ आया।

जब संदीप को लगी गोली

22 अगस्त 2006 को संदीप जर्मनी में होने वाले वर्ल्ड कप की ट्रेनिंग के लिए जा रहे थे। जिसकी टीम का हिस्सा बनने के लिए उन्हें दिल्ली पहुंचना था। संदीप कालका एक्सप्रेस से दिल्ली जा रहे थे। इतने में एक RPF  जवान की सर्विस रिवॉल्वर से गलती से गोली चल गई जो सीधे संदीप की रीढ़ की हड्डी में जा लगी। जैसे ही गोली लगी संदीप पैरालाइज हो गए थे। करियर मानो जैसे अब खत्म हो गया हो। अब तो जान बचा पाना भी नामुमकिन सा लग रहा था। इलाज कराया तो डॉक्टरों ने दो टूक कह दिया कि वो हॉकी के मैदान में कभी वापसी नहीं कर पाएंगे।

लेकिन ये तो अपना संदीप पाजी था जो यूं ही हार नहीं मान सकता था। सूरमा ने डॉक्टरों को बाहर जाने के लिए बोल दिया और अपने भाई को फोन करके हॉकी की स्टिक मंगाई। संदीप हॉकी की स्टिक को अपने पास रखकर सोते थे। जिस हॉकी से उन्होंने पूरा मैदान जीत लिया था, उसी हॉकी के सहारे अब वो एक बार फिर से चलना सीख रहे थे।  हालत में धीरे धीरे सुधार आयाष 6 महीने के लिए संदीप सिंह विदेश चले गए। व्हीलचेयर पर बैठकर चलने वाला संदीप अब अपने पैरों पर खड़ा था।

और यूं बन गए फ्लिकर सिंह

ज़िदंगी चुनौतियों तो बहुत देती है मगर जो हर चुनौती को स्वीकार करलें और उसे लड़कर आगे बढ़ जाए वो संदीप सिंह की तरह ही इतिहास रच देता है। जो मान चुके थे कि संदीप सिंह का हॉकी में करियर खत्म हो चुका है उन सबको गलत साबित करते हुए फ्लिकर सिंह ने 2008 में सुल्तान अज़लान शाह कप के साथ वापसी की। हॉकी के मैदान में उन्होंने 8 ऐसे गोल दागे कि अज़लान शाह कप के फाइनल में मलेशिया को हराकर 13 साल बाद भारत के नाम जीत दर्ज करवाई। 2009 में संदीप सिंह कैप्टन बन गए और फ्लिकर सिंह के नाम से जाने जाने लगे।

तोड़ डाला अपने ही आइडियल का रिकॉर्ड

2012 में संदीप सिंह के 5 गोल की मदद से 8 साल का लंबा इंतज़ार करने के बाद भारत ने ओलम्पिक्स के लिए क्वॉलिफाई किया था। इस मैच में भारत ने फ्रांस को 8-1 के बड़े अंतर से पटखनी दी थी। ऐसे ही संदीप इतिहास रचते चले गए और अपने ही आइडियल धनराज पिल्लै के 121 गोल के रिकॉर्ड को तोड़ डाला। इसके साथ ही 145km/h की रफ्तार से ड्रैग फ्लिक करने का वर्ल्ड रिकॉर्ड भी बनाया।

सूरमा

इसी जज्बे और जुनुन की कहानी लेकर लौट रहे हैं दिलजीत दोसांझ और तापसी पन्नू। तापसी पन्नू उनकी बीवी हरजिंदर कौर का किरदार निभा रही है। संदीप की इस सफलता के पीछे उनकी बीवी हरजिंदर कौर का भी बड़ा खास रोल है। क्योंकि अपनी मोहब्बत के चक्कर में उन्होंने हॉकी की वहीं अकेडमी चुनी जहां उनकी बीवी ट्रेनिंग लेती थी।

खैर संदीप सिंह की ये कहानी 13 जुलाई को रिलीज हो रही है।

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