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सीमा पार के “गांधी” जिन्होंने कांग्रेस से कहा था आपने हमें भेड़ियों के सामने फेंक दिया!

आपने आज़ादी के आंदोलन के दौर में अंग्रेज़ों से लोहा लेने वाले तमाम देश भक्तों की गाथा को सुना होगा। लेकिन क्या आपने एक ऐसे मुस्लिम देश भक्त के बारे में सुना है जिसको न सिर्फ़ सीमान्त गांधी के नाम से नवाज़ा जाता था बल्कि उसने अपने आंदोलन से अंग्रेजी हुकूमत को हिलाकर रख दिया।

बात बादशाह खान यानि अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान की हो रही है। भारत रत्न और गांधी जी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान को कई नामों की उपाधी मिली थी जिनमें सरहदी गांधी, सीमान्त गांधी, बादशाह खान, बच्चा खाँ आदि प्रमुख हैं।

अविभाजित भारत के पेशावर, पाकिस्तान में जन्मे अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान की देश भक्ति का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब कांग्रेस भारत का विभाजन रोकने में असफल रही तब गफ्फार खान बहुत आहत हुए। उन्होंने गाँधी और कांग्रेस के अन्य नेताओं से कहा, ‘आप लोगों ने हमे भेड़ियों के सामने फेंक दिया’।

आज़ादी से पहले यानि सन 1910 में बीस साल की उम्र में गफ्फार ने अपने गृहनगर उत्मान जई में एक स्कूल खोला जो बहुत सफल साबित हुआ। 1911 में वो पश्तून स्वतंत्रता सेनानी तुरंग जई के हाजी साहेब के स्वाधीनता आन्दोलन में शामिल हो गए। अंग्रेजी हुकुमत ने उनके स्कूल को सन 1915 में प्रतिबंधित कर दिया। सन 1915 से लेकर 1918 तक उन्होंने पश्तूनों को जागृत करने के लिए लगभग 500 गांवों की यात्रा की जिसके बाद उन्हें ‘बादशाह खान’ का नाम दिया गया।

अंग्रेज़ों ने जब 1919 में पेशावर में मार्शल लॉ लगाया तो ख़ान ने उनके सामने शांति प्रस्ताव रखा और बदले में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। सन 1930 में गाँधी-इरविन समझौते के बाद ही अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान को जेल से मुक्त किया गया। सन् 1937 के प्रांतीय चुनावों में कांग्रेस ने पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत की प्रांतीय विधानसभा में बहुमत प्राप्त किया तो ख़ान मुख्यमंत्री बने। उसके बाद सन् 1942 में वह फिर गिरफ्तार कर लिए गए। उसके बाद तो 1947 में अंग्रेजों से मुल्क आजाद होने के बाद ही उन्हें जेल से आजादी मिली। उससे एक दशक पहले ही वह महात्मा गांधी के सबसे करीबी और विश्वसनीय हो चुके थे। महात्मा गांधी के सचिव महादेव देसाई ने कभी कहा था कि अपनी खूबियों की वजह से गफ्फार खां तो गांधी जी से भी आगे निकल गए।

ख़ान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान कहते थे कि इस्लाम अमल, यकीन और मोहब्बत का नाम है। उन्होंने कांग्रेस के समर्थन से भारत के पश्चिमोत्तर सीमान्त प्रान्त में ऐतिहासिक ‘लाल कुर्ती’ आन्दोलन चलाया। अब्दुल गफ्फार खान बताया करते थे कि ‘प्रत्येक खुदाई खिदमतगार की यही प्रतिज्ञा होती है कि हम खुदा के बंदे हैं, दौलत या मौत की हमें कदर नहीं है। हमारे नेता सदा आगे बढ़ते चलते हैं। मौत को गले लगाने के लिए हम तैयार हैं। …मैं आपको एक ऐसा हथियार देने जा रहा हूं जिसके सामने कोई पुलिस और कोई सेना टिक नहीं पाएगी। यह मोहम्मद साहब का हथियार है लेकिन आप लोग इससे वाकिफ नहीं हैं। यह हथियार है सब्र और नेकी का। दुनिया की कोई ताकत इस हथियार के सामने टिक नहीं सकती।’

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