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‘सेकुलर कांग्रेस’ आना चाहती है हिंदुत्व की राह पर !

कर्नाटक की चुनावी परिस्थितियों पर आयुष सूर्यवंशी का विश्लेषण 

एक वो दौर था जब ‘इंडिया इज इंदिरा’ और ‘इंदिरा इज इंडिया’ के चर्चे चलते थे राष्ट्रीय सियासत में, फिर इंदिरा गांधी की मौत के बाद राजीव गांधी को भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा बहुमत मिला, पर कांग्रेस के इन दिग्गजों की कहानी आज सिर्फ सियासी किस्सों तक सीमित हो चुकी हैं बिलकुल कांग्रेस पार्टी की तरह, क्योंकि आज 133 साल पुरानी पार्टी का वजूद सिर्फ चार राज्यों तक सिमट कर रह गया है और अब न इंदिरा जैसी छवि वाला कोई नेता कांग्रेस के पास है न 1985 की सहानुभूति वाली लहर, अब तो सिर्फ राहुल गांधी का चेहरा है और सोनिया की रणनीति और इन्हीं पर सारा दारोमदार है ।

अगर ये कहें कि कांग्रेस की विचारधारा जरूरतों के आधार पर बदलती रही है तो शायद ये बात गलत इसलिए नहीं होगी क्योंकि कांग्रेस के शब्दकोष में ‘विचारधारा’ शब्द के साथ ‘लचीलापन’ शब्द भी है और वही लचीलापन पिछले कुछ महीनों से फिर देखने को मिल रहा है ।   

अगर आपको याद हो तो गुजरात चुनाव के वक्त राहुल गांधी मंदिर दर मंदिर देवी-देवताओँ के हाथ के पंजों से कांग्रेस के पंजे के लिए आशीर्वाद मांग रहे थे । राहुल गांधी ने गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान करीब 28 से ज्‍यादा मंदिरों में माथा टेका था. हालांकि कांग्रेस राज्‍य में अपनी सरकार बना नहीं पाई, लेकिन मंदिर प्रभावित इलाकों में उसे काफी फायदा हुआ था और बीजेपी को कड़ी टक्‍कर दी थी. राहुल के ‘मंदिर प्रेम’ के पीछे यही वजह बताई गई कि कांग्रेस की छवि कहीं न कहीं हिंदुओं के मन से दूर जा रही थी, जिसके चलते कांग्रेस अध्यक्ष ने ये रुख अख्तियार किया। अब कर्नाटक में चुनाव होने को हैं और फिर राहुल गांधी ‘सेकुलर कांग्रेस’ को हिंदुत्व की राह पर ले आते दिख रहे हैं ।

 राहुल गांधी की कर्नाटक चूनाव से पहले “मंदिर–होपिंग” रणनीति:

10 फरवरी – हुलिगम्मा मंदिर

12 फरवरी –   शरणाबसप्पा मंदिर

            ख्वाजा बंदे नवाज दरगाह

20 मार्च –   मोकर्णनाथश्र्वर मंदिर

            ऊल्लाल दरगाह

           रोसारियो केथेड्रल चर्च

21 मार्च –  श्रृंगेरी शारदा मंदिर

राहुल गांधी राज्‍य में अपनी यात्र के दौरान एक दिन में एक से ज्‍यादा मंदिरों की दौड़ लगाते दिख रहे हैं और 12 मई 2018 को 224 विधानसभा सीटों के लिए होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए प्रचार तेजी पकड़ता जा रहा है। मंदिरों की चौहद्दी राहुल गांधी की अरदास कितना सुनती है, ये बात कर्नाटक के वोटर्स तय करेंगे लेकिन ये तो तय है कि विचारधारा न भी बदले तस्वीर और तकदीर बदलने की जुगत तो जरूर हैं ।

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