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बॉलीवुड के ‘ठाकुर’ संजीव कुमार की अनसुनी दास्तां

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में दिवंगत एक्टर संजीव कुमार का नाम हर किसी से परिचित है। इंडस्ट्री में उनका नाम एक ऐसे एक्टर के तौर पर जाना जाता है जो हर किरदार में खुद को ढाल लेते थे और बेहद संजीदगी के साथ उसे परदे पर उतार देते थे। 9 जुलाई उनके जन्मतिथि पर आइए ले चलते हैं आपको वक़्त के उस दौर में जहां संजीव कुमार जैसे स्टार ने अपना परचम तो लहराया लेकिन ज़िंदगी में कई उतार चढ़ाव भी झेले। नज़र डालेंगे उनकी जीवन के अनसुने पन्नों पर।

गुजरात के एक मिडल क्लास फैमिली में जन्मे संजीव कुमार के बचपन का नाम हरिहर जरीवाला था। उनके पिता का नाम जेठालाल जरीवाला था। उनका पैतृक घर सूरत में था मगर उनके एक्टिंग के शौक और किस्मत ने उन्हें मुंबई बुला लिया।  मुंबई ने ही उनको नया नाम संजीव कुमार दिया जिस नाम से हम सब उन्हें जानते हैं। करियर के शुरूआती वक़्त में वो थिएटर से जुड़े हुए थे फिर बाद में उन्होंने एक्टिंग स्कूल भी ज्वाइन किया। 1960 में संजीव कुमार ने अपने फिल्मी करियर की नींव रखी एक छोटी सी भूमिका निभा कर, फिल्मालय बैनर की ‘हम हिंदुस्तानी’ से ।  ये उनके लिए वो दरवाज़ा बना जो सीधे उन्हें कामयाबी की बुलंदियों पर ले गया जिसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को एक से बढ़कर एक शानदार फिल्में दी।

संजीव कुमार ने सिर्फ 20 साल के कम उम्र में  कई छोटी- छोटी भूमिकाएं निभाई और इस कम उम्र में भी उन्होंने एक वृद्ध का इतना दमदार अभिनय किया की उस वक़्त सीनियर रहे एक्टर पृथ्वीराज कपूर भी उनके कायल हो गए। संजीव कुमार ने अपने मात्र 25 साल के फिल्मी करियर में 50  से ज्यादा बेहतरीन फिल्में की । हालांकि एक स्टार होने के बावजूद उन्होंने कभी कोई नखरे नहीं किये।
वर्ष 1962 में राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म आरती के लिए स्क्रीन टेस्ट दिया जिसमें वह असफल हुए । कई बी-ग्रेड फ़िल्में भी मिली बावजूद इसके संजीव कुमार ने हार नहीं मानी। । सर्वप्रथम मुख्य अभिनेता के रूप में संजीव कुमार को वर्ष 1965 में प्रदर्शित फ़िल्म ‘निशान’ में काम करने का मौका मिला। वर्ष 1960 से वर्ष 1968 तक संजीव कुमार फ़िल्म इण्डस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिये संघर्ष करते रहे।

1975 में आयी ब्लॉकबस्टर फिल्म शोले जिसमें उनके ठाकुर के किरदार को आज भी याद किया जाता है। संजीव कुमार के उम्दा अभिनय से न सिर्फ दर्शक बल्कि उस वक़्त के हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के बड़े बड़े दिग्गज कलाकार भी स्तब्ध थे। गुलज़ार के साथ उन्होंने कुल 9 फिल्में की जिनमे 1975 की आंधी एक एपिक फिल्म मानी जाती है। 1975 में ही आयी फिल्म  मौसम ,फिर 1982 में अंगूर, नमकीन जैसी  फिल्में उनके नाम रही। 1974 में आयी फिल्म ‘नया दिन नयी रात’ में संजीव कुमार ने 9 किरदार निभाकर सबको हैरान किया तो वही 1972 की फिल्म कोशिश में उन्होंने एक गूंगे बहरे व्यक्ति का किरदार निभाया। 1968 में फिल्म संघर्ष में संजीव कुमार ने एक सीन में दिलीप कुमार की बाहों में दम तोड़ने की एक्टिंग कुछ ऐसी निभायी की खुद दिलीप कुमार भी काफी हैरान रह गए थे।

1968 में आयी फिल्म आशीर्वाद,राजा और रंक ,अनोखी रात ,शिकार , 1969 में आयी सत्यकाम जैसी फिल्मों ने संजीव कुमार के अभिनय की छाप हर जगह छोड़ी और उन्हें उस स्तर पर ले गयी जहां वो अपनी भूमिकाओं का चयन स्वयं कर सकते थे। साल 1970 में आयी फिल्म खिलौना बेहद कामयाब रही जिससे संजीव कुमार की एक अभिनेता के तौर पर एक अलग पहचान बनी। वही इसी फिल्म दस्तक और कोशिश ने उन्हें बेस्ट एक्टर का राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया। फिल्म दस्तक का गाना मैं रे संजीव कुमार का सबसे पसंदीदा गाना भी था।

1973 में आयी फिल्म सीता और गीता और अनहोनी ने उन्हें एक सफल स्टार का दर्जा प्रदान किया। । संजीव कुमार के दौर में राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, धर्मेन्द्र, शम्मी कपूर, दिलीप कुमार जैसे अभिनेता छाये हुए थे, फिर भी अपने सशक्त अभिनय से उन सबके बीच काम करते हुए उन्होंने फ़िल्मजगत में अपना स्थान बनाया। लेखक सलीम ख़ान ने फिल्म त्रिशूल में संजीव कुमार को अपने हमउम्र अमिताभ बच्चन और शशि कपूर के पिता की भूमिका निभाने का आग्रह किया तो उन्होंने बेझिझक यह भूमिका एेसे निभायी कि मानों वो ही लीड एक्टर हों।

विख्यात निर्देशक सत्यजीत रे ने अपनी एकमात्र हिंदी फिल्म ‘शतरंज के खिलाड़ी’ के लिए नायक संजीव कुमार को ही मिर्ज़ा सज्जाद अली के किरदार में चुना जो एक ऐतिहासिक फिल्म के तौर पर देखी जाती है।
हर फिल्म में चाहे कॉमेडी हो या सीरियस या रास में डूबे किरदार संजीव कुमार ने हर भूमिका को बेहद खूबसूरती से निभाया है जिसे मैच कर पाना काफी मुश्किल है। आज के दौर के एक्टर ऋतिक रोशन की हाल ही में आयी फिल्म काबिल जिसमें उन्होंने एक अंधे का किरदार निभाया  था कुछ वैसा ही संजीव कुमार सालों पहले फिल्म क़त्ल में निभा चुके हैं। वही परेश रावल की फिल्म ओह माय गॉड से काफी मेल खाता किरदार संजीव साहब ने फिल्म यही है ज़िंदगी में निभाया।

आइये जानते हैं उनके निजी जीवन के कुछ ऐसे वाक्यों को जो अमिट है। संजीव कुमार के फिल्मों की तरह उनके प्रेम के चर्चे भी काफी मशहूर थे। उनके नाम से जुड़ी प्रेम कहानियां भी बड़ी लंबी रही मगर दुर्भाग्यवश उनका प्यार अपनी मंज़िल कभी न पा सका।

संजीव कुमार की करीबी मित्र रहीं अंजू महेन्द्रू ने उनसे जुड़े कई बातें दुनिया से साझा की थी जो अब आप भी जान लीजिये–संजीव कुमार ने कभी शादी नहीं की मगर उन्हें प्यार कई बार हुआ। कहा जाता है की संजीव कुमार काफी शक्की मिज़ाज के थे जिस कारण उन्हें हमेशा यही लगता की लडकियां उनके दौलत के चलते उनसे शादी करना चाहती थी और यही मुख्य कारण बना उनके और सुलोचना पंडित के टूटे रिश्ते की। ये भी सुनने में आया था की एक्ट्रेस नूतन ने सेट पर ही संजीव कुमार को ज़ोरदार थप्पड़ जड़ दिया था वजह ये रही की उस दौर में नूतन एक सफल अभिनेत्री थी और वो संजीव कुमार के साथ फिल्म देवी की शूटिंग कर रही थी उसी वक़्त ये अफवाह उड़ाई गयी की नूतन संजीव कुमार से जल्द शादी करेंगी हालांकि वो शादी शुदा थी। इस बात से नूतन बहुत नाराज़ हुई और उन्होंने इस अफवाह के लिए संजीव कुमार को चाँटा लगा दिया।

संजीव कुमार का नाम सबसे ज़्यादा अभिनेत्री हेमा मालिनी से जोड़ा गया और फिल्म शोले के रिलीज़ के ठीक पहले उन्होंने हेमा को प्रोपोज़ भी किया था मगर हेमा ने मना कर दिया था। आप शायद ये नहीं जानते होंगे की 1975 की ब्लॉक बस्टर फिल्म शोले में वीरू का किरदार पहले संजीव कुमार निभा रहे थे जिसे बाद में बदल दिया गया और धर्मेंद्र को लिया गया क्यूंकि रमेश सिप्पी यही चाहते थे और वीरू का किरदार जो भी निभाता वो हेमा के साथ ज्यादा रहता। वैसे सुने तो ये भी आया है की धर्मेंद्र फिल्म की शूटिंग में लाइट वालों को पैसे देते की उनका हेमा के साथ सीन कई बार रिटेक हो तो वही संजीव कुमार सेट पर आते ,एक टेक में शूट करते और शाम तक शराब में डूबे रहते। आगे उन्हें हेमा मालिनी के साथ एक फिल्म में उनके पति का किरदार निभाना था जिसे लेने से उन्होंने मना कर दिया और मीडिया में हीरोइन के साथ अपनी समस्या बताई।

संजीव कुमार खानदानी रूप से रहे दिल की बीमारी से भी जूझ रहे थे जिसपर उनके रिश्तों का काफी असर पड़ा,बताया जाता था की उनके घर में किसी भी पुरुष ने 50 के ऊपर ज़िंदगी नहीं जी और उनके साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उनका अमेरिका में बायपास सर्जरी भी हुआ और फिर 1985 में उनके छोटे भाई की मृत्यु के 6 महीने बाद 6 नवंबर 1985 में उनका भी देहांत हो गया। उनके परिवार में एक विचित्र अंधविश्वास प्रचलित था की बड़े बेटे के दस वर्ष होने पर पिता की मृत्यु हो जाएगी और कुछ ऐसे ही उनके दादा, पिता भाई सभी की मृत्यु हुई। उन्होंने अपने स्वर्गीय बड़े भाई के बेटे को गोद लिया जिसके 10 वर्ष के होते ही संजीव कुमार चल बसे। उन्हें लज़ीज़ खाने का भी बहुत शौक था खासतौर पर उन्हें बंगाली भोजन काफी प्रिय था । 

संजीव कुमार की दोस्त अंजु ने बताया की मरने तक संजीव कुमार अपना खुद का घर नहीं ले पाए ,जब भी उन्हें कोई बंगला पसंद आता तो वो उसे खरीदने के लिए पैसे जोड़ते मगर तब तक उसके दाम और बढ़ जाते और जब घर फाइनल किया तो वो लीगल मामलों में उलझ गया और इसी क्रम में वो ताउम्र किराए के घर में ही रहे।

संजीव कुमार के देहांत के बाद उनकी 10 फिल्में रिलीज़ हुई जिसमे एक फिल्म थी लव एंड गॉड और इसमें गुरु दत्त हीरो थे जिन्होंने फिल्म पूरी होने के पहले ही आत्महत्या कर ली जिसके बाद संजीव कुमार को फिल्म में लिया गया लेकिन वो भी चल बसे और फिर फिल्म के डाइरेक्टर भी नहीं रहे।हालांकि डाइरेक्टर की पत्नी ने जैसे तैसे फिल्म रिलीज़ कर दिया था।

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