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एशियन गेम्स में BRONZE मेडल जीतने वाले इस खिलाड़ी की कहानी आपको जाननी चाहिए

हमारे देश में दिखावे का शौक ज्यादा है. यहां नेता फोटो खिंचवाने के लिए मौके पर घोषणाएं, वादे तो बहुत कर देते हैं लेकिन बाद में उन घोषणाओं का क्या होता है वो बताने की ज़रूरत नहीं. इन्हीं घोषणाओं और वादों में असल समस्या छुप जाती है. और स्पोर्ट्स इसका सटीक उदाहरण पेश करता है. खिलाड़ी अच्छा परर्फोम करे तो शाबाशी, नेता फोटो खिंचाते हैं, बड़ी-बड़ी बातें कर देते हैं. लेकिन बाद में हालात पहले जैसे हो जाते हैं.

चाय बेचने पर मजबूर

अभी हाल ही में इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में एशियन गेम्स हुए और भारत के खिलाड़ियों ने अच्छा प्रदर्शन करते हुए 69 मेडल जीते. इनमें से कुछ खिलाड़ियों को जहां इनाम के तौर पर करोड़ों  का राशि देने का वादा किया गया है, जिससे वे खेल में अपने सपने को पूरा कर सकेंगे. लेकिन कुछ को अपने पुराने काम पर लौटना पड़ा है. नहीं समझे तो हम समझाते हैं उस खिलाड़ी की कहानी जिसने भारत को कांस्य दिलाया.

जीता है ब्रॉन्ज मेडल

सेपक टकरा एक खेल है और एशियन गेम्स में दिल्ली के हरीश कुमार कांस्य पदक जीतने वाली टीम के सदस्य थे. दरअसल हरीश दिल्ली के मजनू का टीला में अपने पिता की दुकान पर चाय बेचते हैं. मेडल जीतने से पहले भी चाय बेचा करते थे और मेडल जीतने के बाद भी चाय बेचने की मजबूरी है. आप कह सकते हैं कि कुछ अच्छे पलों के अलावा ज्यादा बदला नहीं. नौकरी मिल गई होती तो शायद चाय न बेचनी पड़ती. बहरहाल इंडोनेशिया से लौटने के बाद हरीश अपने काम में जुट गए हैं और अपने पिता का हाथ बंटा रहे हैं. उनके घर की आजीविका इस चाय की दुकान पर टिकी है.

हरीश कुमार के मुताबिक उनका परिवार बड़ा है और आय का स्रोत कम है. हरीश कहते हैं मैं चाय की दुकान पर पिता की मदद करता हूं. समय निकाल कर 2 बजे से 6 बजे तक चार घंटे खेल का अभ्यास करता हूं. हरीश की मां ने कहा कि हमने बड़े संघर्ष से अपने बच्चों को बड़ा किया है. हरीश के पिता ऑटो ड्राइवर हैं और साथ में हमारी एक चाय की दुकान है. हरीश के पिता हरीश की इस कामयाबी के लिए हरीश के कोच हेमराज का धन्यवाद करते हैं. जो हरीश को खेल में लाए और खेलना सिखाया.

हरीश के मुताबिक उन्होंने 2011 से इस खेल को खेलना शुरू किया, उनके कोच हेमराज ने उन्हें खेलना सिखाया. हरीश ने कहा कि हम भी टायर के साथ खेला करते थे जब मेरे कोच हेमराज ने मुझे देखा और मुझे स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) में ले गए. इसके बाद मुझे मासिक फंड और किट मिलना शुरू हुआ. मैं हर दिन अभ्यास करता हूं और अपने देश के लिए और अधिक पुरस्कार लाने के लिए इसे जारी रखूंगा.

कब बदलेगा…

यहां जिम्मेदारी नैतिकता की है, खुद के अंदर झांकने की है. एक खिलाड़ी जिसके जीतने पर नेता फोटो खिंचाने से नहीं हटते. अभ्यास का समय मिलेगा नहीं तो कैसे मेडल आएगा. ये हम सबको सोचना चाहिए, क्योंकि किसी खिलाड़ी के जीतने पर ताली तो बजा दी जाती है लेकिन पीछे की महनत नहीं मालूम होती. ज़रूरत है इन खिलाड़ियों के भविष्य सुरक्षित करने की, जबतक भविष्य सुरक्षित होगा नहीं खिलाड़ी का डर जाएगा नहीं.

 

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