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एक ऐसी हिरोइन जिसने करियर से ज्यादा प्यार पाने के लिए संघर्ष किया

By- Bhawna Gupta

जब प्यार किया तो डरना क्या…जब जब इस गाने की गूंज कानों में सुनाई देगी तब तब उस हसीं का नूरानी चेहरा ज़हन में आएगा। यूं तो वालिद ने नाम दिया था मुमताज़ जहां दहलवी पर सिल्वर स्क्रीन से वो बन गई थी मधुबाला। मधुबाला के हुस्न का जादू आज भी हर उम्र के नाज़रीनों पर बखूबी कायम है।

हसीं इत्तेफाक है कि दिल्ली के एक पठान के बगीचे में गुल भी उसी दिन खिला जिस दिन मोहब्बत में चूर दिवाने अपने प्यार का इज़हार करते हैं। जी हां यानि मधुबाला का जन्म 14 फरवरी यानि वेलेटाइन्स डे को ही हुआ था। मगर एक अजीब इत्तेफाक ये भी हुआ कि प्यार के दिन जन्मी इस कली की मोहब्बत ए दास्तां अधूरी ही रह गई। आज इस आर्टिकल में मधुबाला की मोहब्बत की दास्तानों का ज़िक्र करेंगे।

बेबी मुमताज बनी मधुबाला

उसके होठों की हसीं, उसके चेहरे का नूर, वो नज़ाकत भरी आंखें ही काफी थी किसी को अपना बनाने के लिए। एक गुमनाम शायर ने तो कह दिया कि वो सांस लेता ताज़महल है। आपको बता दें कि मधुबाला का जन्म 14 फरवरी 1933 को हुआ था। मधुबाला 11 भाई बहन थे जिनमें वो पांचवें नंबर पर थी। मधुबाला बचपन से बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट काम करने लगी थी मगर कौन जानता था कि ये बेबी मुमताज़ एक दिन मधुबाला बन जाएगी।

दिलीप कुमार से मुलाकात

सिनेमा जगत के ट्रेजिडी  किंग दिलीप कुमार और मधुबाला की मुलाकात ज्वार भाटा के सेट पर शुरु हुई थी और मोहब्बत हुई फिल्म तराना के सेट पर। इनकी मोहब्बत किसी रोमांटिक फिल्म की स्क्रिप्ट की तरह शुरु हो गई और जल्द ही फिर खत्म भी हो गई। मधुबाला महज़ 17 साल की थी जब दिलीप कुमार के इश्क की हथकड़ियों में गिरफ्तार हो गई थी। सात साल तक उनका इश्क परवान तो चढ़ा मगर इस प्यार को मंज़िल न मिल सकी। कहते हैं कि मधुबाला की ज़िंदगी में उनके वालिद का बेहद दखल था। उनकी प्रोफेशनल लाइफ से उनके लव लाइफ तक।

मधुबाला के वालिद को ये मोहब्बत मंज़ूर न थी और इसी के चलते दोनों की राहें अलग हो गई। एक किस्सा याद आता है जिसका ज़िक्र खुद दिलीप साहब ने अपनी आत्मकथा- द सबस्टेंस एंड द शैडो- एन ऑटोबायोग्राफी में भी किया है। वो लिखते हैं कि एक सीन में हम दोनों के होठों के बीच पंख आ जाता है, जिससे कई तरह की सोच को पंख लग जाते हैं, लेकिन इस सीन को उस वक्त शूट किया गया था जब हम दोनों की बातचीत एक-दूसरे से एकदम बंद थी। यहां तक की हाय हैलो भी नहीं। जिस सीन की दिलीप साहब बात कर रहे हैं वो सीन मुगल-ए-आज़म का था।

और अलग हो गए दिलीप-मधुबाला

वालिद प्रेम में विलेन गए, दो प्यार करने वाले अलग हो गए। उनकी मोहब्बत पिता के दबाव के आगे झुक गई। मगर प्यार की मूरत को फिर एक बार मोहब्बत हुई। इस बार मधुबाला का दिल धड़का गायक और नायक किशोर कुमार के लिए और ये फिल्म थी चलती का नाम गाड़ी। एक लड़की भीगी भागी गाकर किशोर दा ने मधुबाला को अपने इश्क के रंग में रंग लिया। यूं तो किशोर कुमार तलाकशुदा थे मगर मधुबाला को इसकी परवाह न थी और दोनों ने 1960 में एक-दूसरे से शादी कर ली। किशोर दा ने अपना नाम बदल लिया और मधुबाला के प्यार में किशोर कुमार से बन गए अब्दुल करीम।

मधुबाला की बीमारी

मधुबाला के पिता अताउल्लाह चाहते थे कि वो पहले डॉक्टरों से सलाह से अपना इलाज़ कराए उसके बाद ही किशोर साहब से शादी करें। मगर न जाने मधुबाला को कौनसी जल्दबाजी थी। निकाह हुआ और मधुबाला की तबीयत बिगड़ने लगी, लंदन जाकर डॉक्टरों से सलाह ली तो पता चला कि उनके दिल में छेद है। उस समय उनकी इस बीमारी का इलाज मुमकिन न था। अब मधुबाला टूट चुकी थी।

किशोर कुमार ने मुंबई में बंगला लिया और मधुबाला को वहीं रखा मगर खुद उनके साथ ना रहें। उनका देखभाल के लिए एक नर्स और ड्राइवर को रख दिया। मगर किशोर साहब शायद ये ना जान पाए कि ज़िंदगी के जिस दौर से मधुबाला गुज़र रही है उन्हें मोहब्बत और साथ की जरुरत है। धीरे धीरे मधुबाला की बीमारी बढ़ती गई, तबीयत बिगड़ती गई। वो ज़िदंगी और मौत के दरम्यां खड़ी थी, किशोर साहब ऐसे में उनके फोन तक उठाने बंद कर दिए। देखने आना भी बंद कर दिया। मधुबाला को अब यह एहसास हो गया था कि उनकी मोहब्बत ए दास्ता इस ज़िंदगी में तो पूरी न हो पाएगी।

मधुबाला महज 36 साल की जब दिल की इस बीमारी और प्यार की तड़प में उनकी मौत हुई थी। 23 फरवरी 1969 को वो इस दुनिया के रंगमंच से अपना किरदार निभाकर चली गई।

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