Blogs Khabron se Hatkar

किन्नर कैलाश -जानें इस दुर्गम शिवधाम की महिमा और रहस्य

हमारे देश भारत और सटे पड़ोसी देश में भगवान शिव के कई शिवलिंग स्थित हैं और इससे जुड़े कई रहस्य और पौराणिक कथा  को छिपाये है। आज जिस शिवधाम के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं वो कई रहस्यों का सागर है। ऐसा कहा जाता है की इस धाम की यात्रा  इंसान अपने जीवन में सिर्फ एक बार ही कर पाने की हिम्मत रखता है। किन्नौर कैलाश जिसे आम भाषा में यहां के लोकल किन्नर कैलाश कहते हैं।यह हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले में स्थित है। किन्नर कैलाश पर्वत पर शिवलिंगम 79 मीटर की ऊचाई पर  सीना ताने खड़ा है। भारत तिब्बत बॉर्डर से सटे किन्नौर को  खूबसूरती के लिए जाना जाता है। मानसरोवर के नजदीक कैलाश के चोटियों  से जन्मा  सतलुज नदी किन्नौर से बहकर निकलता है जो इसकी खूबसूरती को और बढ़ाता है। किन्नर कैलाश स्थित शिवलिंगम अपने कई रहस्यों के लिए जाना जाता है। इसे दूसरा सबसे बड़ा कैलाश पर्वत माना जाता है जिसका सफर बहुत कठिन होता है। समुद्र तल से इसकी ऊचाई तक़रीबन 24  हज़ार फ़ीट बताई जाती है जो धार्मिक रूप से हिन्दुओं और बुद्धिस्टों के लिए काफी महत्व रखता है। कई बार लोग इसे गलती से तिब्बत स्थित कैलाश पर्वत समझ लेते हैं।

किन्नर कैलाश को एक बहुत कठिन धार्मिक यात्रा के तौर पर जाना जाता है। इस शिवलिंगम से जुड़ा  रहस्य ये है की इसका रंग दिन के हर पल के साथ बदलता रहता है जो की अपने आप में एक गुत्थी है। हिन्दू मान्यतों के अनुसार भगवान शिव इसी पर्वत पर देवी देवताओं के साथ बैठकें करते थे और इसी कारण  इसे शिव का शीतकालीन निवास भी कहा जाता है। किन्नर कैलाश पर आपको ब्रह्मकमल के हज़ारों  पौधे दिख  जाएंगे जो एक अद्भुत दृश्य है। सावन का महीना इस स्थान के लिए विशेष महत्व रखता है क्यूंकि हर साल जुलाई और अगस्त के महीने में यहां  लाखों श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं। इस यात्रा का रास्ता जंगलो और खतरनाक रास्तों से होकर गुज़रता है।  इस यात्रा की शुरुआत जिला मुख्यालय से 7  किलोमीटर दूर नेशनल हाईवे 5  स्थित पोवारी से सतलुज नदी को पार कर तंगलिंग गांव से हो कर जाना पड़ता है। वही गणेश पार्क से तक़रीबन 500 मीटर की दुरी पर पार्वती कुंड स्थित है इसके बारे में ये कहा जाता है की अगर पूरी सच्ची श्रद्धा के साथ इसमें सिक्का डाला जाएं तो मन की मुराद ज़रूर पूरी होती है।

किन्नर कैलाश जाने वाले भक्त इस कुंड में स्नान करने के बाद तक़रीबन 24 घंटे का कठिन सफर पार कर किन्नर कैलाश स्थित शिवलिंग के दर्शन कर पाते हैं। इस धाम से लौट ते वक़्त भक्त ब्रह्मकमल और औषधीय फूल प्रसाद के रूप में ले जाते हैं।

कब हुई यात्रा की शुरुआत 

इस कठिन धार्मिक यात्रा की शुरुआत 1993 में सबसे पहले हुई थी क्यूंकि उससे पहले इस जगह पर लोगों का जाना मना था। इस  शिवलिंग की परिक्रमा की इच्छा लिए काफी संख्या में लोग यहां पहुंचते हैं।

शिवलिंग से जुड़ी पौराणिक कथा

किन्नर कैलाश के बारे में कई कथाएं कही जाती हैं। कुछ धार्मिक विद्वान ये बताते हैं की महाभारत काल में इस कैलाश का नाम इन्द्रकीलपर्वत था और यहां भगवान शिव और अर्जुन के बीच युद्ध हुआ था। ये भी कहा गया है की पांडवों ने अपने वनवास का अंतिम समय यही पर गुज़ारा था। किन्नर कैलाश को वाणासुर का कैलाश भी कहा जाता है।  कहा जाता है की किन्नर कैलाश के आगोश में श्री कृष्ण के पोते का विवाह हुआ था।

क्यों बदलता है शिवलिंग अपना रंग बार बार 

किन्नर कैलाश स्थित इस विशाल शिवलिंग को लेकर एक चमत्कारी बात कही जाती है की दिन के हर क्षण में   ये शिवलिंग अपना रंग बदलता है। सूर्योदय से पहले सफ़ेद ,सूर्योदय होने पर पीला ,मध्यान्ह में ये लाल होता है और फिर डूबते हुए शाम तक काला हो जाता है। हालांकि ऐसा क्यों है ये अब तक एक रहस्य है। किन्नौर के लोग इसे एक चमत्कार के रूप में देखते हैं। हालांकि वैज्ञानिक इसे सूर्य की किरणों के कारण ही वजह मानते है।

हिमाचल का बद्रीनाथ 

किन्नर कैलाश को हिमाचल का बद्रीनाथ भी कहा जाता है।  साथ ही इसे रॉक कैसलके के नाम से भी कई लोग जानते हैं। इस विशाल शिवलिंग की परिक्रमा करना बहुत ही मुश्किल काम है जहाँ कई भक्त स्वयं को रस्सियों से बांधकर परिक्रमा पूरी करते हैं। इस पुरे पर्वत का  एक चक्कर पूरा करने में 7  से 10 दिन तक का समय लग जाता है। ये कहा जाता है की किन्नर कैलाश पर्वत की यात्रा करने से आपकी सारी इच्छाएं पूर्ण होती हैं।

इस साल यानि  2018 में  सावन यात्रा  1 अगस्त से 11 अगस्त तक चलेगा।

ये भी देखें-

किन्नर कैलाश-हिमाचल का बद्रीनाथ 

/* ]]> */