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धर्म, जात और अंधविश्वास के आलोचक थे कबीरदास, उनके दोहों से आज सीखना चाहिए

कबीरदास

#1

कांकर पाथर जोरि कै मस्जिद लई बनाय। 

ता चढि मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय॥

दोहे का अर्थ समझाने से पहले ये बताना जरूरी है कि कबीरदास धर्म-जात और अंधविश्वास के आलोचक थे. कबीर ने अपने दोहों के जरिए हिंदू धर्म की आलोचना की तो वहीं मुस्लिम धर्म पर भी उन्होंने जमकर कटाक्ष किया और तर्कवादी और मानवीय मूल्यों को सर्वोपरि रखा. आईये बताते हैं उनके द्वारा लिखे उन दोहों को जो आज भी धार्मिक कट्टरता को चुनौती देते हैं

ऊपर लिखे दोहे का अर्थ है-  कबीर उन मुस्लिम धर्मगुरुओं को बहरा बोल रहे हैं जिनको नमाज़ (इबादत) के लिए बांग लगानी पड़ती है, यह लोग खुद क्यों नही आते नमाज़ पढ़ने (खुद- आय)? “का बहरा भया खुद आय”. मन मे तड़प होनी चाहिये इबादत के लिये, बार-बार बांग लगा के पूजा क लिये बुलाना कबीरदास को ठीक नहीं लगा होगा.

#2

पाहन पूजै हरि मिले, तो मैं पूजूं पहार।

ताते यह चाकी भली, पीस खाए संसार।।

अर्थ: इस दोहे में दो अलग अलग बातें की हैं 1. पत्थर जैसा मन और हृदय से हरि नहीं मिल सकते, और अगर मिलते हैं तो कबीर जी उनको पूजना चाहेंगे जिनका हृदय पहाड़ जैसा कठोर है (क्योंकि उनको तो हरि सदा ही समक्ष होंगे). और 2. घर की चक्की को कोई नहीं पूजता अर्थात कोई भी “पत्थर” को नहीं पुजता है क्योंकि अगर पत्थर को पूजता तो वो चक्की को भी पुजता.

#3

कबीरा कुंआ एक हैं, पानी भरैं अनेक ।
बर्तन में ही भेद है, पानी सबमें एक।।

अर्थः कुंआ तो एक ही होता है और पानी सब भरते हैं, जरूर उस सोच में ही कमी है क्योंकि बर्तन ही अलग है पानी सब जगह एक है.

15वीं सदी के भारत में रहस्यवादी कवियों और संतों  में से एक कबीरदास की आज 500वीं पुण्यतिथि मनाई जा रही है. कबीरदास उस समय की बढ़ती कट्टरता से परेशान थे. इतना ही नहीं वे हिन्दू धर्म-इस्लाम के आलोचक थे. उन्होंने यज्ञोपवीत और खतना को बेमतलब करार दिया और इन जैसी धार्मिक प्रथाओं की सख्त आलोचना की। कहा जाता है कि हिन्दू और मुसलमान दोनों ने उन्हें अपने विचार के लिए धमकी भी दी थी.
ऊपर लिखे हुए दोहों को आप तक पहुंचाना का हमारा मकसद सिर्फ जानकारी साझां करना है.  

 

 

 

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