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उत्तर प्रदेश की इस जगह के राजा ने जवाहर लाल नेहरु को दिया था पहला काम

बात उन दिनों की है जब पंडित जवाहर लाल नेहरु विदेश से वक़ालत की पढ़ाई करने के सात साल बाद हिन्दुस्तान वापस लौटे ही थे। इतने सालों तक विदेश में रहने के बाद वो भारत के माहौल में घुलने-मिलने की कोशिश कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने हाईकोर्ट में अपनी वक़ालत की प्रेक्टिस की शुरुआत की, इतना ही नहीं इस सब से इतर नेहरु अपनी ज़िन्दगी के पहले काम के अवसर की तलाश में भी थे। नेहरु ने लिखी अपनी जीवनी ‘मेरी कहानी’  में लिखा है कि, “इग्लैंड की अपनी सात बरस की ज़िन्दगी में मेरी जो आदतें-भावनाऐं बन गई थीं, वे, जिन चीज़ों को मैं यहां देखता था उससे मेल नहीं खाती थीं। परंतु उतना काफी न था। उसके बाद तो वही बार लाईब्रेरी, वही क्लब और दोनों में वही साथी जो उन्हीं पुराने विषयों पर आम तौर चर्चा किया करते थे। निस्संदेह यह वातावरण ऐसा न था जिससे बुध्दि को कुछ गति या स्फूर्ति मिले, और मेरे जीवन में बिल्कुल नीरसपन का भाव घर करने लगा।“

Jawaharlal Nehru

लेकिन 12 अक्टूबर 1912 का वो दिन नेहरु की ज़िन्दगी के लिए बेहद ख़ास था। इस दिन नेहरु किसी काम में व्यस्त थे, कि तभी उन्हें अपने पिता मोतीलाल नेहरु का ख़त मिला। मोतीलाल नेहरु ने इस ख़त में जवाहर लाल के पहले काम मिलने को सुनिश्चित किया था। साथ ही बताया था कि उनके पहले काम की फ़ीस 500 रुपए है।

ख़त में लिखा था:

“प्रिय जवाहर,

एक अति जोशीले मुवक्किल ने तुम्हें फ़ीस के रुप में 500 रु. का मनीआर्डर भेजा है और यह मसूरी में तुम्हारे पास पुन: प्रेषित हुआ है। तुम्हारे पिता को जो पहली फीस मिली वो मात्र 5 रु. थी। इससे स्पष्ट होता है कि तुम मुझसे सौ गुना ज्यादा हो। मुझे इच्छा होती है कि मैं अपने बजाये अपना बेटा होता। इस मुवक्किल का नाम राव महाराज सिंह है। वह कासगंज के हैं। हाईकोर्ट में उनके कई मुकदमे हैं और मुझे नहीं मालूम कि वह उनमें से किसमें तुम्हें नियुक्त करना चाहते हैं। पर यह धन तुम्हारा है और तुम्हारी माताजी को खुशी होगी कि तुम्हें यह पहली फीस के रुप में मिला।

                                                                                                                               -तुम्हारा प्रिय पिता”

इस ख़त को पढ़ने के बाद जवाहर लाल नेहरु बेहद भावुक हुए और उन्होंने उन 500 रुपयों को एक बार चुमा और अपना पहला काम मिलने की प्रशंसा में फूले नहीं समा रहे थे।

अपने पिता के उन कथनों और उनके वचनों पर चल कर जवाहर लाल नेहरु न सिर्फ विख्यात वक़ील बने बल्कि उन्होंने इस वतन का प्रतिनिधित्व भी किया।

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