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‪”प्रधानमंत्री जन औषधि योजना” कितनी कारगर होती, अगर धरातल पर भी असर दिखाई देता

अक्सर सरकार की योजनाएं बीच अधर में फंस जाती हैं जिनका लाभ मिलना तो चाहिए था हकदार को यानी जनता को, लेकिन सरकार और जनता के बीच पहुचंते पहचुंते योजना का दम घुट जाता है. कभी भ्रष्टाचारियों के हाथों तो कभी लालची लोगों द्वारा.

अपने लोगों के हित के लिए हर देश की सरकार कई योजनाएं चलाती हैं. भारत में ऐसी कई योजनाएं मौजूद हैं जिनसे जनता का फायदा हो सकता है लेकिन वो तब मुमकिन है जब सरकार की वो योजना धरातल पर ठीक ढंग से काम करे.  हमारे देश में योजनाओं को ज्यादा महत्व है क्योंकि यहां सियासत इसी पर टिकी है. जितनी ज्यादा योजनाएं उतना ज्यादा समर्थन. मौजूदा समय में केंद्र सरकार की एक ऐसी ही योजना है “प्रधानमंत्री जन औषधि योजना”.

जन औषधि केंद्र
जन औषधि केंद्र

मोदी सरकार ने 1 जुलाई 2015 को इस योजना की घोषणा कर लोगों के हित में सोचा था. इस योजना का मकसद महंगी दवाई से छुटकारा दिला कर जेनरिक दवाईयां मुहैया कराना था. लेकिन शुरुआत दिनों में योजना ने दम दिखाया और लोगों को महंगी दवाईयों से राहत भी मिली. जो दवाई हजारों रुपये की होती थी वो कम दाम पर मिलने लगी. लेकिन ज्यादा दिनों तक नहीं.

परेशान हैं जन औषधि केंद्र चालक

क्योंकि सरकार के दावे के बाद जिन लोगों ने ‘जन औषधि स्टोर’ खोले थे वो आज दवाई नहीं आने से परेशान है. क्योंकि जिस ‘ब्यूरो ऑफ फार्मा पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग ऑफ इंडिया’  को दवाई उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध किया गया था वो आज समय पर दवाई नहीं पहुंचा रही. और हाल ये है कि आज उन औषधि केंद्रों का खर्चा निकालने के लिए आज उन केंद्रों के मालिकों को परचून का सामान बेचना पड़ रहा है.

 

ऐसा नहीं है कि जन औषधि योजना की शुरुआत मोदी सरकार ने ही की हो. इससे पहले यूपीए के शासनकाल यानी 2008 में इस योजना की शुरुआत की गई थी. मकसद वही था जनता को राहत देना. लेकिन उस समय सरकार ने ठीक से योजना को चलाया नहीं और योजना ठप होती चली गई. और फिर मोदी सरकार ने 2015 में इस योजना का उद्घाटन दोबारा किया. और जनता भी सरकार का पूरा सहयोग किया. लेकिन आज हाल अलग  हैं और औषधि केंद्रों में अब औषधि है ही नहीं.

एक नजर आंकड़ों पर …

2008 में UPA के शासनकाल में हुई योजना की शुरुआत

2008- 2013 के बीच सिर्फ 157 जन औषधि केंद्र खुले

हाल और भी बुरा होता चला गया

साल 2014 में मात्र ग्यारह नए केंद्र खोले गए

2015 में PM नरेंद्र मोदी ने फिर से इस योजना की शुरआत की

देश में अब करीब 3214 जन औषधि केंद्र हैं

लेकिन  ज्यादातर जन औषधि केंद्र ठप पड़े हैं.

दवाईयों की आपुर्ति के कारण योजना ने दम तोड़ा

कहने को देश में इस वक्त तीन हजार छह सौ चौदह जन औषधि केंद्र हैं… लेकिन हकीकत यह है कि ज्यादातर केंद्रों में दवाइयां नहीं है ही नहीं.  ऐसे में जब लोगों को सस्ती दवाइयां नहीं मिल पा रही हों तो ऐसी योजना का क्या फायदा. अब 2019 के चुनाव नजदीक है. यानी इन योजनाओं को गिना कर वोट मांगने का दौर शुरू होने वाला है.

 

 

 

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