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अ..से आम, अ..से आरक्षण! दलितों के लिए नेता नहीं भगवान हैं भीमराव अंबेडकर

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अलग-अलग धर्म और विभिन्न जातियों से बना भारत

मैं तुम्हारे हाथ से पानी नहीं ले सकता क्योंकि तुम अछूत हो, तुम्हारे साथ खाना खाने से मेरा मान खराब हो जाएगा, तुम अगर रास्ते से गुजर जाओगे तो ये रास्ता अपवित्र हो जाएगा. ये महज कुछ साधारण सी लाइनें हैं जो आजादी से पहले तक आम थी. अधिकतर स्वर्ण नीची जाति के लोगों को इंसान ही नहीं समझते थे. लेकिन भारत आजाद हो गया और आजाद भारत की तस्वीर कुछ और थी क्योंकि एक शख्स ऐसा था जिसे खुद को दलित कहलाना पसंद नहीं था.

आज  बीआर अंबेडकर की 127वीं जयंती है

19वीं सदी में उस रूढ़ीवादी सोच में जन्में कोई और नहीं रामजी सकपाल थे. जो बाद में भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर बने और जिन्होंने इस विशाल भारत के संविधान को जन्म दिया. आज यानी 14 अप्रैल 2018 को बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की 127वीं जयंती के मौके पर पूरा देश उन्हें सलाम कर रहा है. जिन बाबा साहब को सिर्फ दलितों तक ही सीमित कर दिया गया असल में उन बाबा साहब का दायरा बेहद विशाल और उन रूढ़ीवादी ख्यालों को चुनौती देने वाला और महिलाओं के अधिकारों की पैरवी करने वाला है.

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रुढ़ीवाद समाज में जन्में थे भीमराव

जिस दौर में बाबा साहब का जन्म हुआ था उसकी कल्पना करना आसान है, इस लेख की शुरुआती लाइनें उस बात की तस्दीक करती हैं. नीची जाति के लोगों को हीन और अछूत समझा जाता था. साथ बैठकर खाना तो बहुत दूर की बात है उस वक्त दलितों की छाया पड़ना भी अशुभ मानने की प्रथा थी. मंदिरों में जाने की इजाजत नहीं, जिस तालाब से सब पानी पीते हों उस तालाब से पानी लेने की इजाजत नहीं और मुख्यता शिक्षा जिसकी कल्पना करना खुदकुशी जैसा था. लेकिन क्या आज सब कुछ बदल गया है? क्या आज भेदभाव नहीं है? किसी को दलित कहने पर गाली तो नहीं लगता? क्या मुख्य वर्ग की सोच में प्ररिवर्तन आया? पूरी तरह से नहीं. क्योंकि आज भी यूपी के कुछ गांव में दलितों को अपनी ही शादी में बारात ले जाने का हक नहीं है पुलिस की सहायता से पुलिस द्वारा तय किए गए रूट पर ही बारात निकाली जा सकती है.

आज भी है भेदभाव?

क्या आप वो गुजरात का केस भूल गए हैं? जब एक दलित को घोड़ा रखने और उसकी सवारी करने पर ऊंची जाति के लोगों द्वारा उसका कत्ल कर दिया गया. लेकिन फिर देश चल रहा है. हो सकता है कुछ लोगों की सोच शायद नहीं बदले लेकिन जिन लोगों ने दलितों को आम इंसान मानना शुरु कर दिया है उनकी आज कमी नहीं है.

14 अप्रैल 1891 को जन्में थे भीमराव

14 अप्रैल 1891 को मध्यप्रदेश के महू में महार(नीची) जाति में जन्में बाबा साहब के पिता ब्रिटिश हुकुमत में काम करते थे जिसके चलते उन्हें स्कूल में दाखिला मिल गया, जो उस वक्त नीची जाति के लोगों का हक नहीं था. लेकिन परेशानी यहीं नहीं रुकती, उन्हें स्कूल में पानी पीने से पहले हाथ धोने पड़ते थे, संस्कृत पढ़ने की इजाजत नहीं फिर भी डॉ भीम राव अंबेडकर ने अपने शिक्षा हासिल की, भले ही कमरे के बाहर से क्यों ना ऐसे में यहां समझना चाहिए उन विधार्थियों को जो प्रेरणा स्त्रोत ढूंढते हैं जो मौका न मिलने का बहाना बना कर पढ़ाई का जिम्मा किसी और पर फोड़ देते हैं.

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स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री थे भीमराव

भीमराव स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री थे. उन्होंने हिंदू धर्म में व्याप्त छूआछूत, दलितों, महिलाओं और मजदूरों से भेदभाव जैसी कुरीति के खिलाफ आवाज बुलंद की और इस लड़ाई को धार दी. वे महार जाति से ताल्लुक रखते थे, जिसे हिंदू धर्म में अछूत माना जाता था. उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने की वजह से उन्हें कई मुश्किलों का सामना भी करना पड़ा था.

हिंदू रीति रिवाजों से परेशान होकर उन्होंने अक्टूबर 1956 में बौद्ध धर्म अपना लिया. जिसके कारण उनके साथ लाखों दलितों ने भी बौद्ध धर्म को अपना लिया. उनका मानना था कि मानव प्रजाति का लक्ष्य अपनी सोच में सुधार लाना है.

डॉ. अंबेडकर की पहली शादी नौ साल की उम्र में रमाबाई से हुई. रमाबाई की मृत्यु के बाद उन्होंने ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखने वाली सविता से विवाह कर लिया. सविता ने भी इनके साथ ही बौद्ध धर्म अपना लिया था. अंबेडकर की दूसरी पत्नी सविता का निधन वर्ष 2003 में हुआ.

 

 

संविधान निर्माता अंबेडकर

9 भाषाओं के जानकार और 32 डिग्रियां हांसिल करने वाले बीआर अंबेडकर को आजादी के बाद संविधान निर्माण के लिए 29 अगस्त, 1947  को संविधान की प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया. फिर उनकी अध्यक्षता में दो वर्ष, 11 माह, 18 दिन के बाद संविधान बनकर तैयार हुआ. कहा जाता है कि वे नौ भाषाओं के जानकार थे. साल 1990 में, उन्हें भारत रत्न, भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से मरणोपरांत सम्मानित किया गया था.

 

 ‘हिंदू पैदा तो हुआ हूं, लेकिन हिंदू मरूंगा नहीं’

अंबेडकर जिस जद्दोजहद से दलितों को उनका हक दिलाने के लिए जुटे थे,  उतनी ही ताकत के साथ उनके विरोधी भी उन्हें रोकने के लिए जोर लगा रहे थे.

लंबे संघर्ष के बाद जब अंबेडकर को भरोसा हो गया कि वे हिंदू धर्म से जातिप्रथा और छुआ-छूत की कुरीतियां दूर नहीं कर पा रहे तो उन्होंने वो ऐतिहासिक वक्तव्य दिया, जिसमें उन्होंने कहा कि मैं हिंदू पैदा तो हुआ हूं, लेकिन हिंदू मरूंगा नहीं.

 

महात्मा गांधी और अंबेडकर 

बीआर अंबेडकर और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बीच मतभेद किसी से छुपा नहीं है. दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग करने पर गांधी जी अंबेडकर के खिलाफ हो गए और अनशन पर बैठ गए. देश में तनाव बढ़ा और अनशन के कारण गांधी जी की तबियत भी बिगड़ने लगी थी. अंत में मजबूर होकर बाबा साहेब ने 24 सितम्बर 1932 अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग छोड़ दी, और तब जाकर पूना पैक्ट हुआ जिसके तहत अछूत वर्ग के लिए पृथक निर्वाचक मंडल को रद्द कर दिया गया था. इस तरह बाबा साहेब ने पूना पैक्ट पर साइन करके गाँधी जी का अनशन खत्म कराया.

 

हिंदू कोड बिल पर विरोध

आजादी के बाद पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल में डॉक्टर अंबेडकर कानून मंत्री बने और नेहरू की पहल पर उन्होंने हिंदू कोड बिल तैयार किया, लेकिन इस बिल को लेकर भी उन्हें जबर्दस्त विरोध झेलना पड़ा. खुद नेहरू भी तब अपनी पार्टी के अंदर और बाहर इस मुद्दे पर बढ़ते दबाव के सामने झुकते नजर आए.

इस मुद्दे पर मतभेद इस कदर बढ़े कि अंबेडकर ने कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया. हालांकि बाद में हिंदू कोड बिल पास हुआ और उससे हिंदू महिलाओं की स्थिति में क्रांतिकारी बदलाव भी आया, लेकिन अंबेडकर के बिल से ये कई मामलों में लचीला था.

 

बाबा साहब कहते थे कि ः

  • जीवन लम्बा होने के बजाय महान होना चाहिए.
  • मैं ऐसे धर्म को मानता हूं जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा सिखाता है.
  • हिन्दू धर्म में विवेक, कारण और स्वतंत्र सोच के विकास के लिए कोई गुंजाइश नहीं है.

 

बहरहाल आज दौर बदल गया है लोगों में बदलाव भी आ रहा है. समय के साथ जो हजारों सालों के घाव हैं वो भी जरूर भर जाएंगे. पहले अ… से आम सिखाया जाता था लेकिन समय के चक्र ने सब बदल दिया और अब अ… से आरक्षण सिखाया जाता है, यानी बचपन से ही एक खास वर्ग के प्रति नफरत भर दी जाती है. नफरत भी कोई साधारण नहीं बल्कि ऐसी जो एक शब्द के जरिए आपके भीतर तक समा जाए और वापसी में सामने वाले को आंखे नीचे करने पर मजबूर कर दे. मतलब साफ है यानी “दलित”.